श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  3.2.127 
मृतिः, यथा —
दनुज-दमन याते जीवने त्वय्य् अकस्मात्
प्रचुर-विरह-तापैर् ध्वन्त-हृत्-पङ्कजायाम् ।
व्रजम् अभि परितस् ते दास-कासार-पङ्क्तौ
न किल वसतिम् आर्ताः कर्तुम् इच्छन्ति हंसाः ॥३.२.१२७॥
 
 
अनुवाद
मृत्यु (मृत्यु के समान लक्षण) का एक उदाहरण: "हे दैत्यों के संहारक! आप ही उनके प्राण हैं! जब से आप व्रज से अचानक चले गए हैं, तब से उनके शरीर रूपी सरोवरों में स्थित हृदय रूपी कमल विरह की अग्नि से सूख गए हैं। उनके प्राण रूपी हंस उस स्थिति में दुखी होकर अब वहाँ रहना नहीं चाहते।"
 
An example of death (characteristics similar to death): "O destroyer of demons! You are their very life! Ever since you suddenly departed from Vraja, the lotuses of their hearts, situated in the lakes of their bodies, have dried up in the fire of separation. The swans of their lives, saddened by that condition, no longer wish to remain there."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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