| श्री भक्ति रसामृत सिंधु » सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस » लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा) » श्लोक 120 |
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| | | | श्लोक 3.2.120  | जागर्या, यथा —
विरहान् मुर-द्विषश् चिरं विधुराङ्गे परिखिन्न-चेतसि ।
क्षणदाः क्षण-दायितोज्झिता बहुलाश्वे बहुलास् तदाभवन् ॥३.२.१२०॥ | | | | | | अनुवाद | | वियोग में अनिद्रा का एक उदाहरण: "राजा बहुलाश्र्व, कृष्ण से लंबे समय तक वियोग में, शरीर और मन से व्यथित हो गए। उनकी कई रातें नींद के सुखद स्वरूप को त्याग गईं।" | | | | An example of insomnia in separation: "King Bahulasva, in long separation from Krishna, became distressed in body and mind. Many of his nights were deprived of the pleasant form of sleep." | | ✨ ai-generated | | |
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