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श्लोक 3.2.115  |
यथा —
बलि-सुत-भुज-षण्ड-खण्डनाय
क्षतज-पुरं पुरुषोत्तमे प्रयाते ।
विधूत-विधुर-बुद्धिर् उद्धवो’यं
विरह-निरुद्ध-मना निरुद्धवो’भूत् ॥३.२.११५॥ |
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| अनुवाद |
| वियोग का एक उदाहरण: "जब कृष्ण बाण (बलिपुत्र) की भुजाएँ काटने के लिए शोणितपुर गए, तो उद्धव का मन विरह से व्याकुल हो गया। दुःख के कारण उनकी बुद्धि व्याकुल हो गई और वे आनंदहीन हो गए।" |
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| An example of separation: "When Krishna went to Shonitpur to cut off the arms of Bana (Baliputra), Uddhava's mind was troubled with separation. His mind was disturbed by grief and he became joyless." |
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