श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 113
 
 
श्लोक  3.2.113 
यथा वा —
हरि-चरण-विलोकाब्धि-तापावलीभिर्
बत विधूत-चिद्-अम्भस्य् अत्र नस् तीर्थ-वर्ये ।
श्रुइत्-पुट-परिवाहेनेशनामामृतानि
क्षिपत ननु सतीर्थाश् चेष्टतां प्राण-हंसः ॥३.२.११३॥
 
 
अनुवाद
एक और उदाहरण: "हे शिष्यों! हमारे पूज्य गुरुदेव उस तीर्थ के समान सूख गए हैं जिसमें पवित्र जल ही नहीं है, जो उनका जीवन है। ऐसा भगवान के चरणों के दर्शन न होने के कारण उत्पन्न विरह की ज्वाला के कारण हुआ है। उनके कान के मार्ग से उस तीर्थ में भगवान के नाम का अमृत डालो, तो उनके जीवनरूपी हंस में प्राण आ जाएँगे।"
 
Another example: "O disciples! Our revered Gurudev has dried up like a holy place that has no holy water, which is his life. This has happened due to the flame of separation caused by not being able to see the feet of God. Pour the nectar of God's name into that place through his ears, and the swan of his life will come to life."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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