श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 2: दास्य-रस (प्रीति और सेवा)  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  3.2.111 
यथा वा —
क्वचिन् नटति निष्पटं क्वचिद् असम्भवं स्तम्भते
क्वचिद् विहसति स्फुटं क्वचिद् अमन्दम् आक्रन्दति ।
लसत्य् अनलसं क्वचित् क्वचिद् अपार्थम् आर्तायते
हरेर् अभिनवोद्धुर-प्रणय-सीधुम् अत्तो मुनिः ॥३.२.१११॥
 
 
अनुवाद
एक अन्य उदाहरण: "भगवान के प्रति नवीन प्रेम के अमृत से मतवाले नारद कभी नग्न होकर नाचते, कभी अनुचित रूप से स्तब्ध हो जाते, कभी जोर से हंसते, कभी जोर से चिल्लाते, कभी बिना थके खेलते, और कभी ऐसे घूमते जैसे उन्हें पीड़ा हो रही हो, जबकि पीड़ा का कोई कारण ही नहीं था।"
 
Another example: "Narada, intoxicated with the nectar of new love for the Lord, would sometimes dance naked, sometimes become unreasonably stunned, sometimes laugh loudly, sometimes shout loudly, sometimes play tirelessly, and sometimes move about as if in pain, when there was no cause for pain."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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