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श्लोक 3.2.101  |
यथा वा —
विलोचन-सुधाम्बुधेस् तव पदारविन्द-द्वयी
विलोचन-रस-च्छटाम् अनुपलभ्य विक्षुभ्यतः ।
मनो मम मनाग् अपि क्वचिद् अनाप्नुवन् निर्वृतिं
क्षणार्धम् अपि मन्यते व्रज-महेन्द्र वर्ष-व्रजम् ॥३.२.१०१॥ |
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| अनुवाद |
| एक और उदाहरण: "हे कृष्ण! आप नेत्रों के लिए अमृत के सागर हैं। आपके दोनों चरणकमलों के दर्शन का सुख न पाकर मैं व्याकुल हूँ और मेरा मन किसी भी प्रकार की प्रसन्नता प्राप्त नहीं कर पा रहा है। एक क्षण भी कई वर्षों के समान प्रतीत होता है।" |
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| Another example: "O Krishna! You are an ocean of nectar for the eyes. I am distressed because I do not have the pleasure of seeing your two lotus feet, and my mind is unable to attain any kind of happiness. Even a moment seems like many years." |
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