श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 1: शांत-रस (ईश्वर का शांत प्रेम)  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.1.8 
तत्र चतुर्भुजः —
श्यामाकृतिः स्फुरति चारु-चतुर्भुजो’यम्
आनन्द-राशिर् अखिलात्म-सिन्धु-तरङ्गः ।
यस्मिन् गते नयनयोः पथि निर्जिहीते
प्रत्यक्-पदात् परमहंस-मुनेर् मनो’पि ॥३.१.८॥
 
 
अनुवाद
चतुर्भुज रूप: "आनंद से परिपूर्ण और गहरे नीले रंग वाला भगवान का आकर्षक चतुर्भुज रूप एक महासागर है जिसकी लहरें जीव हैं। यदि परमहंस मुनि उन्हें देख लें, तो उनका मन निराकार ब्रह्म को छोड़कर उनके सभी गुणों में लीन हो जाएगा।"
 
Four-armed Form: "The Lord's attractive four-armed form, full of bliss and deep blue in color, is an ocean whose waves are the living entities. If the Paramahamsa Muni sees Him, his mind will become absorbed in all His qualities except the formless Brahman."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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