श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 1: शांत-रस (ईश्वर का शांत प्रेम)  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.1.40 
यथा वा —
क्षेत्रे कुरोः किम् अपि चण्डकरोपरागे
सान्द्रं महः पथि विलोचनयोर् यदासीत् ।
तन् नीरद-द्युति-जयि स्मरद् उत्सुकं मे
न प्रत्यग्-आत्मनि मनो रमते पुरेव ॥३.१.४०॥
 
 
अनुवाद
एक अन्य उदाहरण: "अब जब मैं उस तेज को याद करता हूँ जो एक नए वर्षा वाले बादल के रंग को जीत लेता है, जिसे मैंने सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में देखा था, तो मेरा बेचैन मन अब निराकार ब्रह्म में पहले की तरह आनंद का अनुभव नहीं करता है।"
 
Another example: "Now when I remember the brilliance that conquers the color of a new rain cloud, which I saw at Kurukshetra at the time of a solar eclipse, my restless mind no longer experiences the same joy in the formless Brahman as before."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)