श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 1: शांत-रस (ईश्वर का शांत प्रेम)  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.1.34 
तत्र निर्वेदो, यथा —
अस्मिन् सुख-घन-मूर्तौ परम्-
आत्मनि वृष्णि-पत्तने स्फुरति ।
आत्मारामतया मे वृथा
गतो बत चिरं कालः ॥३.१.३४॥
 
 
अनुवाद
निर्वेद (आत्म-घृणा): "यद्यपि कृष्ण, परमात्मा, साक्षात् आनंदस्वरूप, द्वारका में निवास करते हैं, फिर भी मैं कितना अभागा हूँ! स्वयं को आत्माराम समझकर मैंने कितना समय नष्ट कर दिया है।"
 
Nirveda (self-hatred): "Although Krishna, the Supreme Being, the embodiment of bliss itself, resides in Dwaraka, how unfortunate I am! How much time have I wasted considering myself to be Atmaram."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)