| श्री भक्ति रसामृत सिंधु » सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस » लहर 1: शांत-रस (ईश्वर का शांत प्रेम) » श्लोक 33 |
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| | | | श्लोक 3.1.33  | अथ सञ्चारिणः —
सञ्चारिनो’त्र निर्वेदो धृतिर् हर्षो मतिः स्मृतिः ।
विषादोत्सुकतावेग-वितर्काद्याः प्रकीर्तिताः ॥३.१.३३॥ | | | | | | अनुवाद | | "शांत-रस में, निर्वेद, धृति, हर्ष, मति, स्मृति, औत्सुक्य, अवेद, वितर्क ए और अन्य जैसे संकरी-भाव प्रकट होते हैं।" | | | | "In Shanta-rasa, Sankari-bhavas like Nirveda, Dhriti, Harsha, Mati, Smriti, Utsukya, Aveda, Vitark a and others are manifested." | | ✨ ai-generated | | |
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