श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 1: शांत-रस (ईश्वर का शांत प्रेम)  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.1.32 
एषां निरभिमानानां शरीरादिषु योगिनाम् ।
सात्त्विकास् तु ज्वलन्त्य् एव न तु दीप्ता भवन्त्य् अमी ॥३.१.३२॥
 
 
अनुवाद
“अहंकार से रहित योगियों के शरीर में, सात्विक भाव ज्वलित के रूप में प्रकट होते हैं, परंतु दीप्ति के रूप में नहीं।” [देखें बीआरएस 2.3.73-78]
 
“In the body of the egoless yogi, the sattvic feelings appear as flames, but not as brilliance.” [See BRS 2.3.73-78]
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd