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श्लोक 3.1.29  |
तत्र जृम्भा, यथा —
हृदयाम्बरे ध्रुवं ते
भावाम्बर-मणिर् उदेति योगीन्द्र ।
यद् इदं वदनाम्भोजं
जृम्भाम् अवलम्बते भवतः ॥३.१.२९॥ |
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| अनुवाद |
| जम्हाई लेते हुए: "हे योगीन्द्र! निश्चय ही तुम्हारे हृदय रूपी आकाश में भाव का सूर्य उदय हो गया होगा, क्योंकि तुम्हारा मुखकमल अब जम्हाई लेकर खिल रहा है।" |
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| Yawning: "O Yogindra! Surely the sun of devotion must have risen in the sky of your heart, because your lotus face is now blooming by yawning." |
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