श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 3: पश्चिमी विभाग: मुख्य भक्ति रस  »  लहर 1: शांत-रस (ईश्वर का शांत प्रेम)  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.1.14 
तत्र च भक्तिः —
समस्त-गुण-वर्जिते करणतः प्रतीचीनतां
गते किम् अपि वस्तुनि स्वयम् अदीपि तावत् सुखम् ।
न यावद् इयम् अद्भुता नव-तमाल-नील-द्युतेर्
मुकुन्द सुख-चिद्-घना तव बभूव साक्षात्-कृतिः ॥३.१.१४॥
 
 
अनुवाद
उनकी भक्ति: "हे मुकुन्द! जब तक हमने आपके अद्भुत ज्ञान और आनन्द स्वरूप को, जो नवीन तमाल वृक्ष के समान रंग का है, अनुभव नहीं किया था, तब तक हम इन्द्रियों और प्रकृति के गुणों से परे अवर्णनीय ब्रह्म में लीन थे।"
 
Their devotion: "O Mukunda! Until we experienced Your wonderful form of knowledge and bliss, which is the color of a new Tamala tree, we were absorbed in the indescribable Brahman, beyond the senses and the modes of nature."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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