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श्लोक 2.5.97  |
हरेर् ईषच्-छ्रुति-विधौ रसास्वादः सतां भवेत् ।
रतेर् एव प्रभावो’यं हेतुस् तेषां तथाकृतौ ॥२.५.९७॥ |
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| अनुवाद |
| "भक्तों में भगवान के बारे में थोड़ा-सा श्रवण मात्र से ही रस के प्रति रुचि विकसित हो जाती है। श्रवण की इन क्रियाओं में, रति की शक्ति विभाव और [रस के] अन्य तत्वों की अनुभूति कराती है।" |
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| "Devotees develop a liking for rasa simply by hearing a little about the Lord. In these acts of hearing, the power of Rati brings about the experience of vibhava and other elements [of rasa]." |
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