नवे रत्य्-अङ्कुरे जाते हरि-भक्तस्य कस्यचित् ।
विभावत्वादि-हेतुत्वं किञ्चित् तत् काव्य-नाट्ययोः ॥२.५.९६॥
अनुवाद
"जब काव्य-कृतियों का आनंद लेने वाले में रति का नया अंकुर विकसित होता है, तो वे काव्य-कृतियाँ कुछ हद तक विभाव और [रस के] अन्य तत्वों को साकार करने का कारण बन जाती हैं।"
"When the new sprout of Rati develops in the one who enjoys poetic works, those poetic works become to some extent the cause of realization of Vibhava and other elements [of Rasa]."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥