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श्लोक 2.5.96  |
नवे रत्य्-अङ्कुरे जाते हरि-भक्तस्य कस्यचित् ।
विभावत्वादि-हेतुत्वं किञ्चित् तत् काव्य-नाट्ययोः ॥२.५.९६॥ |
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| अनुवाद |
| "जब काव्य-कृतियों का आनंद लेने वाले में रति का नया अंकुर विकसित होता है, तो वे काव्य-कृतियाँ कुछ हद तक विभाव और [रस के] अन्य तत्वों को साकार करने का कारण बन जाती हैं।" |
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| "When the new sprout of Rati develops in the one who enjoys poetic works, those poetic works become to some extent the cause of realization of Vibhava and other elements [of Rasa]." |
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