श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  2.5.95 
यथा स्वैर् एव सलिलैः परिपूर्य बलाहकान् ।
रत्नालयो भवत्य् एभिर् वृष्टैस् तैर् एव वारिधिः ॥२.५.९५॥
 
 
अनुवाद
"यह उस महासागर के समान है जो अपने जल से बादलों को पोषित करता है, तथा उन बादलों से आने वाली वर्षा से स्वयं को पोषित करता है।"
 
"It is like the ocean that nourishes the clouds with its water, and nourishes itself with the rain that comes from those clouds."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)