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श्लोक 2.5.89  |
सञ्चारयन्ति वैचित्रीं नयन्ते तां तथा-विधाम् ।
ये निर्वेदादयो भावास् ते तु सञ्चारिणो मताः ॥२.५.८९॥ |
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| अनुवाद |
| "मानसिक स्थितियाँ जैसे निर्वेद (आत्म-निंदा) जो विभावों द्वारा प्रेरित रति में और अधिक विविधता उत्पन्न करती हैं और अनुभव द्वारा अधिक आनंददायक बना दी जाती हैं, उन्हें संचारी-भाव या व्यभिचारी-भाव कहा जाता है।" |
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| "Mental states such as nirveda (self-reproach) which create more variety in the love induced by the vibhavas and are made more pleasurable by experience are called sanchari-bhava or vyabhichari-bhava." |
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