श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  2.5.89 
सञ्चारयन्ति वैचित्रीं नयन्ते तां तथा-विधाम् ।
ये निर्वेदादयो भावास् ते तु सञ्चारिणो मताः ॥२.५.८९॥
 
 
अनुवाद
"मानसिक स्थितियाँ जैसे निर्वेद (आत्म-निंदा) जो विभावों द्वारा प्रेरित रति में और अधिक विविधता उत्पन्न करती हैं और अनुभव द्वारा अधिक आनंददायक बना दी जाती हैं, उन्हें संचारी-भाव या व्यभिचारी-भाव कहा जाता है।"
 
"Mental states such as nirveda (self-reproach) which create more variety in the love induced by the vibhavas and are made more pleasurable by experience are called sanchari-bhava or vyabhichari-bhava."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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