श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  2.5.87 
रतेस् तु तत्-तद्-आस्वाद-विशेषायातियोग्यताम् ।
विभावयन्ति कुर्वन्तीत्य् उक्ता धीरैर् विभावकाः ॥२.५.८७॥
 
 
अनुवाद
"जो परिस्थितियाँ रति (प्रेम का रिश्ता) को विशेष स्वाद का आनंद लेने के लिए बहुत उपयुक्त बनाती हैं, उन्हें बुद्धिमान लोग विभाव (उत्तेजना) कहते हैं।"
 
"The conditions which make Rati (love relationship) very suitable for enjoying a special taste are called Vibhav (excitement) by the wise."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)