श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  2.5.86 
हित्वा कारण-कार्यादि-शब्द-वाच्यत्वम् अत्र ते ।
रसोद्बोधे विभावादि-व्यपदेशत्वम् आप्नुयुः ॥२.५.८६॥
 
 
अनुवाद
"जब ये आपस में मिलकर रस में परिवर्तित हो जाते हैं तो वे कारण और प्रभाव के नाम त्याग देते हैं, तथा विभाव, अनुभव, सात्विक-भाव और व्यावहारिक-भाव के नाम धारण कर लेते हैं।"
 
"When these combine and transform into rasa, they give up the names of cause and effect and take on the names of vibhava, anubhava, sattvic-bhava and vyavahyavartha-bhava."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd