| श्री भक्ति रसामृत सिंधु » सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस » लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव) » श्लोक 8 |
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| | | | श्लोक 2.5.8  | तत्र शुद्धा —
सामान्यासौ तथा स्वच्छा शान्तिश् चेत्य् आदिमा त्रिधा ।
एषाङ्ग-कम्पता-नेत्रामीलनोन्मीलनादि-कृत् ॥२.५.८॥ | | | | | | अनुवाद | | शुद्धि-रति: "शुद्धि-रति नामक पहली रति तीन प्रकार की होती है: संयम, श्वच्चा और शांत। इससे शरीर में कंपन और आँखों का बंद होना और खुलना होता है।" | | | | Shuddhi-rati: "The first Rati, called Shuddhi-rati, is of three kinds: restraint, pure and calm. This causes vibrations in the body and the closing and opening of the eyes." | | ✨ ai-generated | | |
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