श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  2.5.77 
प्रायः सुख-मयाः शीता उष्णा दुःख-मया इह ।
चित्रेयं परमानन्द-सान्द्राप्य् उष्णा रतिर् मता ॥२.५.७७॥
 
 
अनुवाद
"ऐसा प्रतीत होता है कि हर्ष जैसे भाव सुख से भरे होते हैं और विषाद जैसे भाव दुःख से भरे होते हैं। लेकिन आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि दुःख से भरी रति को सर्वोच्च, सबसे तीव्र आनंद माना जाता है।"
 
"It appears that emotions like joy are filled with happiness and emotions like sadness are filled with sorrow. But the surprising fact is that love filled with sadness is considered the highest, most intense joy."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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