श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  2.5.74 
चेत् स्वतन्त्रास् त्रयस्-त्रिंशद् भवेयुर् व्यभिचारिणः ।
इहाष्टौ सात्त्विकाश् चैते भावाख्यास् तान् असङ्ख्यकाः ॥२.५.७४॥
 
 
अनुवाद
"यदि वे स्वतंत्र रहें, तो तैंतीस व्यभिचारी भाव, ऊपर वर्णित आठ रति और आठ सात्विक भाव उनचास भाव या भावनात्मक अवस्थाएँ कहलाते हैं।"
 
"If they remain independent, the thirty-three Vyabhichari Bhavas, the eight Rati and eight Satvik Bhavas mentioned above are called forty-nine Bhavas or emotional states."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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