श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 73
 
 
श्लोक  2.5.73 
रतित्वात् प्रथमैकैव सप्त हासादयस् तथा ।
इत्य् अष्टौ स्थायिनो यावद् रसावस्थां न संश्रिताः ॥२.५.७३॥
 
 
अनुवाद
"जब तक किसी व्यक्ति में पाँच प्राथमिक रतियों के साथ-साथ सात गौण रतियों में से एक भी रस की स्थिति को प्राप्त नहीं कर लेती, तब तक आठ रतियों को स्थाई भाव कहा जाता है।"
 
"Unless one of the five primary passions as well as the seven secondary passions attains the state of rasa in a person, the eight passions are called permanent passions."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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