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श्लोक 2.5.73  |
रतित्वात् प्रथमैकैव सप्त हासादयस् तथा ।
इत्य् अष्टौ स्थायिनो यावद् रसावस्थां न संश्रिताः ॥२.५.७३॥ |
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| अनुवाद |
| "जब तक किसी व्यक्ति में पाँच प्राथमिक रतियों के साथ-साथ सात गौण रतियों में से एक भी रस की स्थिति को प्राप्त नहीं कर लेती, तब तक आठ रतियों को स्थाई भाव कहा जाता है।" |
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| "Unless one of the five primary passions as well as the seven secondary passions attains the state of rasa in a person, the eight passions are called permanent passions." |
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