श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  2.5.70 
दुष्ट-विभाव-जाः, यथा —
भैरवं ब्रुवति हन्त हन्त गोकुल-
द्वारि वारिद-निभे वृषासुरे ।
पुत्र-गुप्ति-धृत-यत्न-वैभवा
कम्प्र-मूर्तिर् अभवद् व्रजेश्वरी ॥२.५.७०॥
 
 
अनुवाद
कृष्ण का शत्रु भय का कारण: "जब वृषासुर, तूफानी बादल की तरह, गोकुल के प्रवेश द्वार पर भयावह तरीके से दहाड़ने लगा, तो यशोदा, अपने पुत्र की रक्षा के बारे में सोचकर कांपने लगीं।"
 
Krishna's enemy causes fear: "When Vrishasura, like a storm cloud, roared terrifyingly at the entrance of Gokul, Yashoda, thinking of the safety of her son, began to tremble."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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