श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  2.5.68 
निष्पन्नं पूर्ववद् इदं बुधा भय-रतिं विदुः ।
एषापि क्रोध-रतिवद् द्वि-विधा कथिता बुधैः ॥२.५.६८॥
 
 
अनुवाद
"ज्ञानी कहते हैं कि भय, भय-रति से उसी प्रकार संबंधित है जैसे हँस, हँस-रति से संबंधित है। क्रोध की तरह, भय-रति के भी दो प्रकार हैं: भय जिसका कारण कृष्ण हैं और भय जिसका कारण कृष्ण का शत्रु है।"
 
"The wise say that fear is related to bhaya-rati in the same way that laughter is related to bhaya-rati. Like anger, bhaya-rati is of two kinds: fear caused by Krishna and fear caused by Krishna's enemy."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)