श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  2.5.66 
तद्-वैरि-विभावाः, यथा —
अथ कंस-सहोदरोग्र-दावे
हरिम् अभ्युद्यति तीव्र-हेति-भाजि ।
रभसाद् अलिकाम्बरे प्रलम्ब-
द्विषतो’भूद् भ्रू-कुटी-पयोद-रेखा ॥२.५.६६॥
 
 
अनुवाद
शत्रु द्वारा उत्तेजित क्रोध: "जब प्रज्वलित दावानल ने, जो वास्तव में कंस का भाई था, कृष्ण को घेर लिया, तब बलराम के माथे पर क्रोध की एक ऐसी रेखा उभर आई, जैसे आकाश में बादलों का समूह हो।"
 
Anger provoked by the enemy: "When the blazing forest fire, which was actually the brother of Kamsa, surrounded Krishna, a line of anger appeared on Balarama's forehead like a group of clouds in the sky."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)