श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  2.5.60 
अथ शोक-रतिः —
शोकस् त्व् इष्ट-वियोगाद्यैश् चित्त-क्लेश-भवः स्मृतः ।
विलाप-पात-निःश्वास-मुख-शोष-भ्रमादि-कृत् ।
पूर्वोक्त-विधिनैवायं सिद्धः शोक-रतिर् भवेत् ॥२.५.६०॥
 
 
अनुवाद
शोक-रति: "प्रियतम के वियोग में हृदय में उत्पन्न होने वाली तीव्र पीड़ा और यह विचार कि प्रियतम नष्ट हो गया है, शोक या विलाप कहलाती है। इस अवस्था में विलाप, भूमि पर गिरना, भारी साँस लेना, मुँह सूखना और भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है।"
 
Shoka-rati: "The intense pain that arises in the heart at the separation from the beloved and at the thought that the beloved has perished is called grief or lamentation. This state is characterized by wailing, falling to the ground, heavy breathing, dry mouth, and confusion."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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