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श्लोक 6
श्लोक
2.5.6
शुद्धा प्रीतिस् तथा सख्यं वात्सल्यं प्रियतेत्य् असौ ।
स्वपरार्थ्यैव सा मुख्या पुनः पञ्च-विधा भवेत् ॥२.५.६॥
अनुवाद
“इन दो रूपों में एक प्राथमिक रति के पाँच प्रकार होते हैं: शुद्धा, प्रीति (या दास्य),
“In these two forms there are five types of primary Rati: Shuddha, Preeti (or Dasya),
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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