श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  2.5.59 
यथा —
कालिन्दी-तट-भुवि पत्र-शृङ्ग-वंशी
निक्वाणैर् इह मुखरी-कृताम्बरायाम् ।
विस्फूर्जन्न् अघ-दमनेन योद्धु-कामः
श्रीदामा परिकरम् उद्भटं बबन्ध ॥२.५.५९॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "जब यमुना के तट पर बांसुरी, नरसिंगे और पत्र (घास के पत्ते) की ध्वनि से वायु गूंज उठी, तब श्रीदामा ने कृष्ण से युद्ध करने की इच्छा से गर्जना शुरू कर दी और अपनी कमर कस ली।"
 
Example: "When the air on the banks of the Yamuna resounded with the sound of flutes, trumpets and leaves of grass, Sridama roared and girded himself with the desire to fight with Krishna."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd