श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  2.5.54 
यथा —
मया दृग् अपि नार्पिता सुमुखि दध्नि तुभ्यं शपे
सखी तव निरर्गला तद् अपि मे मुखं जिघ्रति ।
प्रशाधि तद् इमां मुधा च्छलित-साधुम् इत्य् अच्युते
वदत्य् अजनि दूतिका हसित-रोधने न क्षमा ॥२.५.५४॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "हे सुंदरी! मैं तुम्हें शपथपूर्वक कहता हूँ कि मैंने दही की ओर देखा तक नहीं। परन्तु तुम्हारी निर्भीक सखी व्यर्थ ही मेरे मुख को सूँघ रही है। अपनी सखी को उपदेश दो कि वह मुझ जैसे निर्दोष व्यक्तियों पर दोष न लगाए।" जब गोपी दासी ने ये शब्द सुने, तो वह अपनी हँसी रोक न सकी।"
 
Example: "O beautiful lady, I swear to you that I did not even look at the curd. But your fearless friend is smelling my face in vain. Advise your friend not to accuse innocent people like me." When Gopi Dasi heard these words, she could not control her laughter.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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