विपक्षादिषु यान्तो’पि क्रोधाद्याः स्थायितां सदा ।
लभन्ते रति-शून्यत्वान् न भक्ति-रस-योग्यताम् ॥२.५.४७॥
अनुवाद
यद्यपि कृष्ण के शत्रुओं में द्वितीयक भाव स्थाई भाव बन जाते हैं, किन्तु वे भक्ति-रस के लिए उपयुक्त नहीं हैं, क्योंकि उनमें प्राथमिक रति (कृष्ण के प्रति सकारात्मक आकर्षण) नहीं होती है।
Although the secondary emotions become permanent emotions in Krishna's enemies, they are not suitable for bhakti-rasa because they do not have primary rati (positive attraction towards Krishna).
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥