श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.5.4 
तत्र स्वार्था —
अविरुद्धैः स्फुटं भावैः पुष्णात्य् आत्मानम् एव या ।
विरुद्धैर् दुःख-ग्लानिः सा स्वार्था कथिता रतिः ॥२.५.४॥
 
 
अनुवाद
"वह प्राथमिक रति जो स्पष्ट रूप से विरोधाभास रहित भावों से स्वयं को पोषित करती है और विरोधाभासी भावों से दुःख से असहनीय रूप से उदास हो जाती है, उसे स्वार्थ-रति (स्वयं को पोषित करना) कहा जाता है।"
 
"That primary Rati which nourishes itself with apparently non-contradictory emotions and becomes unbearably saddened by the suffering of contradictory emotions is called Svartha-Rati (cherishing the self)."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)