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श्लोक 2.5.39  |
अथ गौणी —
विभावोत्कर्षजो भाव-विशेषो यो’नुगृह्यते ।
सङ्कुचन्त्या स्वयं रत्या स गौणी रतिर् उच्यते ॥२.५.३९॥ |
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| अनुवाद |
| गौण-रति (द्वितीयक रति): "जब आलंबन (विभाव) की उत्कृष्टता से उत्पन्न एक अलग भावनात्मक स्थिति प्रकट होती है, जबकि प्राथमिक रति स्वयं को वश में कर लेती है, तो उसे द्वितीयक रति कहा जाता है।" |
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| Gaun-rati (secondary Rati): "When a different emotional state arising from the excellence of the object (vibhava) appears while the primary Rati subdues itself, it is called secondary Rati." |
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