श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  2.5.37 
यथा गोविन्द-विलासे —
चिरम् उत्कुण्ठित-मनसो राधा-मुर-वैरिणोः को’पि ।
निभृत-निरीक्षण-जन्मा प्रत्याशा-पल्लवो जयति ॥२.५.३७॥
 
 
अनुवाद
गोविंदविलास से: "लंबे समय से, राधा और कृष्ण एक-दूसरे को देखने के लिए तरस रहे थे। एक-दूसरे को अकेले में देखने की आशा के नए अंकुर की जय हो!"
 
From Govindavilasa: "For a long time, Radha and Krishna yearned to see each other. Hail the new sprout of hope to see each other alone!"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)