श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.5.35 
यथा वा —
सुतम् अङ्गुलिभिः स्नुत-स्तनी
चिबुकाग्रे दधती दयार्द्र-धीः ।
समलालयद् आलयात् पुरः
स्थिति-भाजं व्रज-राज-गेहिनी ॥२.५.३५॥
 
 
अनुवाद
एक अन्य उदाहरण: "यशोदा, जिनका हृदय स्नेह से कोमल था और जिनके स्तनों से दूध बह रहा था, उन्होंने अपने पुत्र कृष्ण की ठुड्डी को अपनी उंगलियों में पकड़कर उन्हें दुलारा।"
 
Another example: "Yashoda, whose heart was tender with affection and whose breasts were flowing with milk, took the chin of her son Krishna in her fingers and caressed him."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)