श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.5.3 
तत्र मुख्या —
शुद्ध-सत्त्व-विशेषात्मा रतिर् मुख्येति कीर्तिता ।
मुख्यापि द्वि-विधा स्वार्था परार्था चेति कीर्त्यते ॥२.५.३॥
 
 
अनुवाद
मुख्य-रति (प्राथमिक रति): "वह रति जो शुद्ध-सत्व-विशेषात्मा (ह्लादिनी और संवित शक्तियों से बनी) हो, प्राथमिक रति कहलाती है। हालाँकि यह प्राथमिक रति है, लेकिन इसके दो रूप हैं: स्वार्थ और परार्थ।"
 
Mukhya-rati (primary love): "That love which is pure-sattva-visheshaatma (composed of the Hladini and Samvit forces) is called primary love. Although it is primary love, it has two forms: selfishness and altruism."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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