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श्लोक 2.5.28  |
| तत्रासक्ति-कृद् अन्यत्र प्रीति-संहारिणी ह्य् असौ ॥२.५.२८॥ |
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| अनुवाद |
| “यह प्रीति-रति पूजा की वस्तु के प्रति आसक्ति उत्पन्न करती है, और अन्य वस्तुओं के प्रति स्नेह को नष्ट कर देती है।” |
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| “This love-love creates attachment to the object of worship, and destroys affection for other objects.” |
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