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श्लोक 2.5.26  |
तत्र सङ्कुला —
एषां द्वयोस् त्रयाणां वा सन्निपातस् तु सङ्कुला ।
उद्भवादौ च भीमादौ मथुरादौ क्रमेण सा ।
यस्याधिक्यं भवेद् यत्र स तेन व्यपदिश्यते ॥२.५.२६॥ |
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| अनुवाद |
| संकुल-रति: "जब किसी व्यक्ति में तीन प्रकार की रतियों में से दो या तीन एक साथ पाई जाती हैं, तो उसे संकुल-रति (मिश्रित रति) कहते हैं। यह उद्धव, भीम और मुखरा में पाई जाती है। व्यक्ति की पहचान उस रति से होती है जो सबसे प्रमुख होती है।" |
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| Sankul-rati: "When two or three of the three types of Rati are found together in a person, it is called Sankul-rati (mixed Rati). This is found in Uddhava, Bhima and Mukhra. A person is identified by the Rati that is most prominent." |
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