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श्लोक 2.5.22  |
अथ भेद-त्रयी हृद्या रतेः प्रीत्य्-आदिर् ईर्यते ।
गाढानुकूलतोत्पन्ना ममत्वेन सदाश्रिता ॥२.५.२२॥ |
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| अनुवाद |
| "तीन प्रकार की रति—प्रीति, सख्य और वात्सल्य—हृदय को प्रसन्न करती हैं। ये भगवान के प्रति गहन मैत्रीभाव से उत्पन्न होती हैं और भगवान के प्रति सदैव स्वामित्व भाव से युक्त रहती हैं।" |
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| "The three kinds of love—preeti, sakhya, and vatsalya—please the heart. They arise from deep friendship toward the Lord and are always accompanied by a sense of ownership toward Him." |
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