श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.5.19 
यथा —
देवर्षि-वीणया पीते हरि-लीला-महोत्सवे ।
सनकस्य तनौ कम्पो ब्रह्मानुभविनो’प्य् अभूत् ॥२.५.१९॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "जब नारद जी ने अपनी वीणा पर भगवान की लीलाओं का गान किया, तो सनक का शरीर कांपने लगा, यद्यपि वह ब्रह्मज्ञानी था।"
 
Example: "When Narada sang the divine pastimes of the Lord on his veena, Sanaka's body began to tremble, although he was a knower of Brahman."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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