श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.5.18 
प्रायः शम-प्रधानानां ममता-गन्ध-वर्जिता ।
परमात्मतया कृष्णे जाता शान्त-रतिर् मता ॥२.५.१८॥
 
 
अनुवाद
"शम (आत्मज्ञान) की प्रधानता वाले व्यक्तियों में उत्पन्न होने वाली वह रति, जिसमें भगवान के प्रति लेशमात्र भी स्वामित्व का भाव नहीं होता, परन्तु जो परमात्मा रूपी भगवान के प्रति आकर्षण उत्पन्न करती है, उसे शान्त रति कहते हैं।"
 
"That love which arises in persons having predominance of Shama (Self-knowledge), in which there is not even the slightest feeling of ownership towards God, but which generates attraction towards the Supreme Being, is called Shanta Rati."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)