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श्री भक्ति रसामृत सिंधु
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सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस
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लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)
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श्लोक 16
श्लोक
2.5.16
अथ शान्तिः —
मानसे निर्विकल्पत्वं शम इत्य् अभिधीयते ॥२.५.१६॥
अनुवाद
शांति-शुद्ध-रति: “मन के भीतर ज्ञाता और विषय का अभेदभाव शम कहलाता है।”
Shanti-shuddha-rati: “The non-discrimination of the knower and the subject within the mind is called sham.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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