श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.5.14 
यथा —
क्वचित् प्रभुर् इति स्तुवन् क्वचन मित्रम् इत्य् उद्धसन्
क्वचित् तनय इत्य् अवन् क्वचन कान्त इत्य् उल्लसन् ।
क्वचिन् मनसि भावयन् परम एष आत्मेत्य् असाव्
अभूद् विविध-सेवया विविध-वृत्तिर् आर्यो द्विजः ॥२.५.१४॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "शास्त्र के आदेशों का पालन करने में तत्पर एक ब्राह्मण कभी भगवान की स्तुति स्वामी के रूप में करता, कभी मित्र के रूप में उनके साथ विनोद करता, कभी पुत्र के रूप में उनकी रक्षा करता, कभी प्रेमी के रूप में उनकी अभिलाषा करता, और कभी परमात्मा के रूप में उनका हृदय में ध्यान करता। इस प्रकार, विभिन्न सेवा-पद्धतियों द्वारा, वह मन की विभिन्न प्रवृत्तियों से संपन्न हो गया।"
 
Example: "A brahmana, diligent in following the injunctions of the scriptures, sometimes praises the Lord as his master, sometimes plays with Him as his friend, sometimes protects Him as his son, sometimes desires Him as his lover, and sometimes meditates on Him in his heart as the Supreme Being. Thus, by different modes of service, he becomes endowed with different attitudes of mind."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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