श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 134
 
 
श्लोक  2.5.134 
गोपाल-रूप-शोभां दधद् अपि रघुनाथ-भाव-विस्तारी ।
तुष्यतु सनातनात्मा दैक्षिण-विभागे सुधाम्बुनिधेः ॥२.५.१३४॥
 
 
अनुवाद
"वह सनातन पुरुष जिसने ग्वालबाल का सुन्दर रूप प्रकट किया और राम के रूप को भी अपने भाव वितरित किये, वह अमृत सागर के दक्षिणी सागर पर प्रसन्न हो।"
 
"May that eternal being who manifested the beautiful form of the cowherd boy and also distributed his feelings to the form of Rama, be pleased on the southern ocean of the nectar ocean."
 
इति श्री-श्री-भक्ति-रसामृत-सिन्धौ दक्षिण-विभागे
भक्ति-रस-सामान्य-निरूपणे स्थायि-भाव-लहरी पञ्चमी ॥
"इस प्रकार श्री भक्ति-रसामृत-सिंधु के दक्षिणी महासागर में 'स्थिर-भाव' से संबंधित पांचवीं लहर समाप्त होती है।"

इति श्री-श्री-भक्ति-रसामृत-सिन्धौ सामान्य-भगवद्-भक्ति-रस-निरूपको नाम दक्षिण-विभागः समाप्तः ॥
"यहां श्री भक्ति-रसामृत-सिंधु का दक्षिणी महासागर 'सामान्य भक्ति रस' समाप्त होता है।"
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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