श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  2.5.130 
इत्य् एष भक्ति-रसिकश् चौराद् इव महा-निधिः ।
जरन्-मीमांसकाद् रक्ष्यः कृष्ण-भक्ति-रसः सदा ॥२.५.१३०॥
 
 
अनुवाद
"जिस प्रकार कोई व्यक्ति चोरों से बड़े खजाने की सावधानीपूर्वक रक्षा करता है, उसी प्रकार भक्तजन मुरझाये हुए मीमांसकों से भक्ति-रस की रक्षा करते हैं, क्योंकि वे भक्ति का आनन्द लेने के लिए सर्वथा अयोग्य हैं।"
 
"Just as one carefully guards a large treasure from thieves, so devotees guard the essence of devotion from the withered Mimamsakas, who are utterly unfit to enjoy devotion."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)