श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 126
 
 
श्लोक  2.5.126 
सर्वत्र करुणाख्यस्य रसस्यैवोपपादनात् ।
भवेद् रामायणादीनाम् अन्यथा दुःख-हेतुता ॥२.५.१२६॥
 
 
अनुवाद
"यदि करुणा-रस से सुख की प्राप्ति न होती, तो रामायण भावक-भक्तों के लिए दुःख का कारण होती, क्योंकि वह तथा अन्य रचनाएँ सर्वत्र करुणा-रस को प्रकट करती हैं।"
 
"If the sentiment of compassion did not bring happiness, the Ramayana would be a source of sorrow for the devotees, because it and other works everywhere express the sentiment of compassion."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)