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श्री भक्ति रसामृत सिंधु
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सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस
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श्लोक 122
श्लोक
2.5.122
अखण्ड-सुख-रूपत्वे’प्य् एषाम् अस्ति क्वचित् क्वचित् ।
रसेषु गहनास्वाद-विशेषः को’प्य् अनुत्तमः ॥२.५.१२२॥
अनुवाद
"यद्यपि सभी भक्ति-रस शुद्ध आनन्द के अवतार हैं, तथापि रसों में कभी-कभी एक विशेष गहन अतुलनीय स्वाद होता है।"
"Although all devotional rasas are embodiments of pure bliss, the rasas sometimes have a special intense, incomparable flavor."
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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