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श्लोक 2.5.12  |
अथ स्वच्छा —
तत्-तत्-साधनतो नाना-विध-भक्ति-प्रसङ्गतः ।
साधाकानां तु वैविध्यं यान्ती स्वच्छा रतिर् मता ॥२.५.१२॥ |
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| अनुवाद |
| स्वच्छ-शुद्ध-रति: "जब रति अनेक प्रकार से प्रकट होती है क्योंकि साधक विभिन्न प्रकार के भक्तों के साथ संगति करता है और विभिन्न अभ्यास करता है, तो उसे स्वच्छ-रति (पारदर्शी) कहा जाता है।" |
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| Svachha-shuddha-rati: "When Rati manifests in many ways because the practitioner associates with different types of devotees and performs different practices, it is called Svachha-rati (transparent)." |
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