श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  2.5.115 
तत्र मुख्यः —
मुख्यस् तु पञ्चधा शान्तः प्रीतः प्रेयांश् च वत्सलः ।
मधुरश् चेत्य् अमी ज्ञेया यथा-पूर्वम् अनुत्तमाः ॥२.५.११५॥
 
 
अनुवाद
मुख्य-रस (प्राथमिक रस): "प्राथमिक भक्ति-रस पाँच हैं: शांता, प्रीति, प्रेयो, वत्सला और माधुर्य। उत्कृष्टता का क्रम पहले से आखिरी तक है।"
 
Mukhya-rasa (primary rasas): "The primary bhakti-rasas are five: shanta, preeti, preyo, vatsala and madhurya. The order of excellence is from first to last."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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