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श्लोक 2.5.112  |
किं च —
परमानन्द-तादात्म्याद् रत्यादेर् अस्य वस्तुतः ।
रसस्य स्व-प्रकाशत्वम् अखण्डत्वं च सिध्यति ॥२.५.११२॥ |
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| अनुवाद |
| "चूँकि रति और अन्य तत्व ह्लादिनी-शक्ति से अभिन्न हैं, रस भी स्वयं प्रकट होता है और केवल रस से ही बना होता है।" |
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| "Since Rati and other elements are inseparable from Hladini-Shakti, Rasa also manifests itself and is composed of Rasa only." |
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